(मनोज राजपूत)ऑटो रिक्शा वही है, चालक और सीटें भी। बदला है तो सिर्फ पेशा। इन सीटों पर सवारियों की जगह अब सब्जियों ने ले ली है। साथ ही बदला है ऑटो चालकों की बोलचाल का लहजा। पहले रामगढ़, बरवाला, लालडू आदि कस्बों का नाम लेकर सवारियां बिठाने वाले ऑटो चालक आजकल लोगों को ‘टमाटर लो, गोभी-भिंडी, प्याज लो और आलू लो’ कहते सुनाई पड़ रहे हैं।
दरअसल, कोरोना के कारण बदले परिवेश में कुछ ऑटो चालकों ने सब्जी विक्रेताओं का धंधा अपना लिया है। दरअसल, कोरोना के कारण लॉकडाउन में जहां ज्यादातर कारोबार बंद हो गए हैं, जरुरी वस्तुओं में सब्जी सप्लाई और बेचने को भी प्रशासन से छूट प्राप्त है।
इसलिए ऑटो चालक ही नहीं कई रेहड़ी, रिक्शा और फड़ी वालों को भी यह छूट खूब रास आ रही है। बदले परिवेश में पेशा बदलने वाले ऑटो वालों की वजह भी वाजिब है।
उनका कहना है कि काम धंधा बंद होने से जहां परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो रहा था, वही बेकार खड़े ऑटो भी जंग खाने लगे थे। एक जगह खड़े होने टायर खराब और बैटरियां डेड होने लगी थी। खाली बैठने से अच्छा उन्होंने अस्थाई रूप से ही सही, सब्जी का कारोबार चुनकर एक तरह से ऑटो को ही कमाई का नया साधन बना लिया है। इससे उन्हें आसानी से टाइम पास की वजह भी मिल गई है।
यहां बता दें कि लोड वाले ऑटो तो सब्जियां और जरूरी वस्तुओं की लोडिंग अनलोडिंग सेवाओं में पहले की तरह बने ही हुए हैं परंतु सवारी वाले ऑटो बिल्कुल निठल्ले पड़ गए हैं। इन्हीं में से काफी तादाद में ऑटो वाले लॉक डाउन में छूट प्राप्त सब्जी कारोबार का हिस्सा बन गए हैं।
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