ग्राउंड रिपाेर्ट-1 ग्रामीण क्षेत्रों से...
(मैं राहुल दुबे । खतरों के बीच पत्रकारिता धर्म निभा रहा हूं। क्योंकि मेरे परिवार के साथ भास्कर के लाखों पाठकों को भी आज मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है।)

शहर में सब्जी बेचने पर फिलहाल पाबंदी और अनाज मंडियों में गेहूं की आवक पर रोक ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। डेढ़ लाख हेक्टेयर में गेहूं और पांच हजार हेक्टेयर में सब्जी भी जैसे लाॅकडाउन हो गई है। इस बार मौसम ने साथ दिया तो गेहूं की पैदावार बंपर हुई है, लेकिन कोरोना के चलते गेहूं खेत से सीधे मंडी जाने के बजाए किसानों के घर पहुंच रहा है।

कारण यह कि कटा गेहूं खुले में रखा नहीं जा सकता। किसान सब्जी भी नहीं तोड़ रहे। यह खेतों में ही सड़ रही है। सब्जी से किसानों के घर का रोज का खर्च निकलता है। गांव में कैसे किसान परेशान। इन दृश्यों से समझिए

दृश्य-1: गेहूं मंडी भेजना महंगा होगा

देवगुराड़िया, सनावदिया में दोपहर 12 के करीब पहुंचे तो वहां जगदीश थ्रेशर से साफ होकर आया गेहूं ट्रॉली में भरवाकर घर के बाहर खड़ा करवा रहे थे। वे बोले- मंडी बंद है तो गेहूं को अभी घर पर ही रखना पड़ रहा है। अब घर से बोरियों में भरकर मंडी भिजवाना होगा। इससे लागत और बढ़ जाएगी। लाॅकडाउन खत्म होने के बाद किसानों को समर्थन मूल्य के लिए झगड़ना होगा। गेहूं ज्यादा हो गया तो अब कीमत हासिल करने की लड़ाई शुरू होगी।

दृश्य-2: अच्छा आलू बचाने के प्रयास

ग्राम कैलोद में गुलाब सिंह खड़े होकर आलू की छंटाई करवा रहे थे। मालवी आलू हुआ तो बंपर, लेकिन मंडी टाइम पर नहीं पहुंचा। इस कारण 150 किलो से ज्यादा आलू सड़ भी गया। गेहूं भी सात दिन पहले कट गया। मंडी केे बजाए खेत के पास ही एक शेड के नीचे रखा है, ताकि पानी नहीं लग जाए। ग्रामीम संजय शर्मा बोले- फिलहाल जहां भी गेहूं अभी खड़ा है, वह बारूद के ढेर के समान है। पूरी तरह पक चुका। सूखी घास की तरह। गलती से आग लग जाए तो पूरा खेत खत्म हो जाएगा।

दृश्य-3: खेतों में गाय, भैंस को छोड़ा

ग्राम राजद्रा में लौकी, गिलकी के खेतों में किसानों ने गाय, भैंस को छोड़ रखा है। सब्जियां पक गई थीं, बिकने को तैयार थीं।

चोइथराम मंडी में ले जा नहीं सकते तो जानवरों को ही खाने के लिए छोड़ दिया। इतनी सब्जियां हैं कि गाय, भैंस भी नहीं खा पाते। बायपास, एबी रोड के किनारों पर बेचने के लिए बैठ सकते हैं, लेकिन घरों में लाॅकडाउन है तो खरीदने वाला भी कोई नहीं।

किसान सेना के जगदीश रावलिया का कहना है कि प्रशासन ने लाॅकडाउन में आलू-प्याज के भरोसे रहने की बात कही थी, लेकिन यह भी शहर तक नहीं पहुंच रहा है। कम से कम ऐसी व्यवस्था कराई जाए कि यह फसल किसान मंडी में बेच सके।

खाद नहीं मिली और तापमान बढ़ा तो प्याज 80 फीसदी खराब हो जाएगा

किसानों ने प्याज भी लगा रखा हैै। बाजार बंद है और किसानों को खाद कहीं भी नहीं मिल रही है। प्याज को पांच-छह दिन में खाद नहीं मिली और तापमान बढ़ गया तो प्याज 80 फीसदी खराब हो जाएगा। धूप से सूख जाएगा।

 अभी से ही कई जगह प्याज काला पड़ गया है। जिन्होंने प्याज पहले उगा लिया है, उनका खरीदार नहीं मिल रहा। प्याज को अवेर कर रखना भी कम झंझट का काम नहीं है। किसी भी स्थिति में प्याज किसानों के लिए घाटे का सौदा रहेगा। 50 से 60 हजार एकड़ का खर्च प्याज के लिए आता है। प्रतिबंध खुलने के बाद देशभर का प्याज आना शुरू हो जाएगा। ऐसे में लागत निकलना मुश्किल हो जाएगी।

टमाटर, पालक भी खराब हो गए

दोपहर डेढ़ बजे किसान दिनेश गौड़ पत्नी व बच्चों के साथ पालक चुन-चुनकर निकाल रहे थे। वे बोले पालक, गिलकी को ज्यादा दिन खेत में नहीं रखा जा सकता। सब्जी पर रोक लगने से प्याज खेत में ही पीला पड़ गया। लगाने की कीमत भी मिलना मुश्किल है। दो-तीन दिन में हमको अनुमति नहीं मिली तो फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी।

सड़क पर घूम रहे थे 15 भूखे लोग, पता चलते ही टीआई ने पत्नी से बनवाया भोजन

कर्फ्यू में फंसे लोगों की परेशानी को पुलिस के मैदानी सिपाही अच्छे से समझ रहे हैं। उनकी मदद कर रहे हैं और उन्हें सकुशल सुरक्षित स्थानों पर भी भेज रहे हैं। शहर के कई थानों की पुलिस ऐसा कर रही है। विजय नगर में ही रविवार को एक संस्था ने 500 लोगों को भोजन बांटा। उसके कुछ देर बाद पता चला कि 15 लोग भूखे हैं। जानकारी मिलने पर टीआई तहजीब काजी ने उन्हें थाने बुलवाया। फिर अपनी पत्नी को कॉल कर भोजन का प्रबंध करने को कहा। पत्नी ने कुछ ही देर में भोजन बनाकर भेज दिया। लोगों ने भोजन पाकर पुलिस का आभार जताया।


शहर में कर्फ्यू, पास में थाना, फिर भी ठेलों पर बिकती रही सब्जियां
ग्राउंड रिपाेर्ट -2 मल्हारगंज क्षेत्र से...
(मैं सुमित ठक्कर। खतरों के बीच पत्रकारिता धर्म निभा रहा हूं। क्योंकि मेरे परिवार के साथ भास्कर के लाखों पाठकों को भी आज मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है।)

शुक्रवार सुबह का समय। मल्हारगंज इलाके में थाने के पास पहुंचकर मोबाइल देखता हूं तो पता चलता है कि साढ़े सात बजे चुुके हैं। थोड़ा आगे चलकर टोरी कॉर्नर वाली गली में पहुंचता हूं तो लगता ही नहीं कि यहां कर्फ्यू लगा है। सब्जी अाैर फलाें के ठेले लगे हैं। इनके आसपास भीड़ है। आसपास ही टाट पट्‌टी बाखल और अन्य मुस्लिम बस्तियां हैं, जिन्हें कंटेनमेंट एरिया घोषित किया जा चुका है। वहां के लोग भी सब्जियां-फल खरीदने यहां आते हैं।

पास की ही मल्टी से झांककर यह सब देख अनिल गाेयल के पास मैं पहुंचा ताे वह पहले सहम गए। मेरे गले में आईडी कार्ड देखा तो बात करने को तैयार हुए। बोले कि यह रोज की बात है। सब्जी-फल वाले ठेले लेकर आ जाते हैं। फिर गाड़ियों की आड़ में खड़े हो जाते हैं। लोग भी खरीदने पहुंच जाते हैं। ऐसा करना खतरनाक है। पास में रहने वाले नितिन जैन और प्रेक्षा माहेश्वरी ने भी यही चिंता जताई। कुछ अन्य रहवासियों ने बताया कि सब्जी के दो ठेले लेकर दुकानदार सुबह आठ से 11 बजे तक यहां रहते हैं। रहवासियों ने पुलिस व प्रशासन के हेल्पलाइन नंबरों पर कई बार कॉल किए, लेकिन मदद नहीं मिली।

दहशत इतनी कि रहवासी घरों के बाहर भी नहीं देख रहे
ग्राउंड रिपाेर्ट -3- फूटी कोठी क्षेत्र से
(मैं प्रणय चौहान। खतरों के बीच पत्रकारिता धर्म निभा रहा हूं। क्योंकि मेरे परिवार के साथ भास्कर के लाखों पाठकों को भी आज मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है।)

फूटी कोठी। दोपहर तीन बजे। पूरे क्षेत्र में सन्नाटा। फूटी कोठी से चंदन नगर जाने वाला मार्ग बैरिकेड्स और स्टॉपर लगाकर बंद कर दिया है। चंदन नगर से फूटी कोठी आने वाली सड़क चालू है। इस सड़क से भी इक्का-दुक्का वाहन चालक आना-जाना कर रहे हैं। जैसे ही दस्तूर गार्डन की ओर बढ़े तो गार्डन के पास पुलिस जीप में बैठे पुलिसकर्मियों ने रोक लिया। परिचय देने के बाद मुझे गार्डन के नजदीक जाने की इजाजत दी।

 इस क्षेत्र में स्थित मैरिज गार्डनों में संदिग्धों को रखा गया है। दस्तूर गार्डन में 26, अक्षत में 36, ताराकुंज में 26 और श्रीजी वाटिका गार्डन में 12 कोरोना संदिग्धों को रखा है। चारों गार्डन के बाहर 5 से 6 पुलिस जवान बैठे हैं।

 स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने बताया हम भी गार्डन के अंदर सिर्फ जांच करने ही जाते हैं। गोंदवले धाम द्वार की ओर बढ़े तो पुलिसकर्मियों ने कहा यहां से चले जाओ ये सेंसेटिव क्षेत्र है। रहवासी जय ढाकोनिया बताते हैं संदिग्धों को इस क्षेत्र में रखने से स्कीम-71, फूटी कोठी सहित आसपास के रहवासी इतने डरे हुए हैं कि घरों के बाहर तक नहीं झांक रहे हैं।
{आलू खेतों से तो बाहर हो गया है, लेकिन घर के सामने ढेर लग गया है। अब किसान मजदूरों से आलू की छंटाई करवाने में लगे हैं, ताकि खराब आलू को अलग कर सकें।


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