जाति में मात्रा की त्रुटि के चलते सोनझरी आदिवासी समाज के लोग जाति प्रमाण पत्र से वंचित हैं। इससे समाज के लोगों को नौकरी से लेकर किसी भी शासकीय योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इन लोगों द्वारा त्रुटि को सुधारने के लिए वर्षों से आवेदन देकर मांग की जा रही है। एक बार फि जिला आदिवासी समाज के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह कंवर के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल आदिम जाति कल्याण विभाग के मंत्री के ओएसडी व अनु जनजाति आयोग के प्रमुख सचिव को ज्ञापन देकर पुनः त्रुटि सुधारने की मांग की है।
छग के जांजगीर चांपा, राजनांदगांव, बलौदाबाजार, रायपुर कोरबा, जशपुर, कांकेर, धमतरी आदि जिलों में इस समाज के लोग निवास करते हैं तथा अनु जनजाति की उपजाति क्रं 16 में यह जाति दर्ज है। लेकिन 1928-29 के मिसल में इनकी जाति सोनझरा, सोनझोला, सोनझारी आदि दर्ज हो गयी है, और अनुसूचित जनजाति की राज्य सूची में सोनझरी के नाम से दर्ज है।
इस समाज के लोगों का दावा है कि ये सभी एक ही है| इसी कारण है कि इन्हें जाति प्रमाण पत्र नहीं मिल पा रहा है। गरीब व मजदूर वर्ग के होते हुये भी किसी भी शासकीय योजना का लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा है और ना ही सरकारी नौकरी मिल पा रही है।
कौन है सोनझरी जाति के
सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष राजेंद्र कंवर ने बताया कि सोनझरी समाज मूलत: आदिवासी समाज के ही अंग हैं। इनकी संस्कृति, रीति रिवाज, रहन सहन सब आदिवासी समाज के ही समान है। ये लोग सरनेम सोनझरी लिखते हैं, क्योंकि कई पीढिय़ों से इनका मुख्य व्यवसाय व आजीविका का साधन पहाड़ों के झरने व नदियों की रेत से सोना निकालने का था। ये सोने के कण को बेचकर अपना परिवार चलाते आ रहे हैं, इसीलिए इन्हें सोनझरी या सोनझरा व सोनझारा कहते है। ये अनुजनजाति केसूची में 16 वें नंबर मेंदर्ज है।
धारा 170 सबसे बड़ा सबूत
अनुजनजाति की 1972 की धारा 170 ख इनके अनु जनजाति होने का सबसे बड़ा सबूत है। इसके तहत बिना कलेक्टर के परमिशन के कोई भी आदिवासी जमीन की बिक्री व खरीदी नहीं नहीं हो सकती। ये धारा इन सोनझरी समुदाय के लोगों के उपर भी लागू है। ये लोग अपनी जमीन कलेक्टर के अनुमति के बिना नहीं बेच सकते।
मामले की जानकारी लूंगा
"अभी तक तो ये मुद्दा मेरे संज्ञान में नहीं आया है। इसकी पूरी जानकारी लेकर व छानबीन कर ही कुछ कह पाउंगा।''
अतुल वैष्णव, तहसीलदार बलौदा
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