(मनीष दुबे) कोरोना संकट से निबटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को एक माह पूरा हो गया। इस तरह के संकट का सामना करने के लिए न तो प्रशासनिक तंत्र के पास कोई पूर्व तैयारी थी न ही लोगों को इसका कोई अनुभव था। इसके बावजूद प्रशासनिक निगरानी और लोगों के संयम के बल पर हमने शहर को इस रोग की चपेट में नहीं आने दिया। नतीजे में हमें ग्रीन जोन का तमगा मिला और देश के कई दूसरे इलाकों के मुकाबले हमारे यहां जिंदगी तुलनात्मक रूप से सामान्य होने की ओर बढ़ चली है।
इस संकट ने लाखों परिवारों की रोजी रोटी को संकट में डाल दिया है। करीब 3 लाख लोग जो मेहनत करके सम्मान के साथ अपना पेट भरते थे, उन्हें अब दूसरों के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है। 1500 से ज्यादा शादियां टालनी पड़ी। किसानों को रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद औसत कमाई ही हो पा रही है। पर्यावरण की स्थिति बीते कई दशकों में सबसे बेहतर हो गई। हवा में उड़ने वाले वे कण जो हमारे फेफड़ों को छलनी कर सकते हैं, उनकी संख्या आधे से कम रह गई।
इनसे लें प्रेरणा
दो भाइयों ने 25 बीघा की फसल दान दी : कोरोना संकट ने लाखों लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया है। इन हालात से निबटने के लिए कई लोग मदद के लिए आग आ रहे हैं। इनमें रियाज जमा और मुस्तफा कमर जमा का नाम प्रदेशभर में सुर्खियां बना। इन दोनों भाइयों ने अपनी 25 बीघा में लगी गेहूं की पूरी फसल ही दान कर दी।
बड़े आयोजन रद्द हुए तो गरीबों को भोजन बांटा : रामनवमी का जुलूस रद्द होने से रघुवंशी महासभा ने ढाई हजार भोजन के पैकेट गरीबों में बंटवाए। समाज के लोगों ने कहा कि इस मौके पर आयोजित होने वाले भंडारे के लिए जो सामग्री जुटाई गई थी, वह गरीबों में बांटी गई। इसी तरह महावीर जयंती पर प्रस्तावित सामूहिम भोज के लिए जुटाए गए संसाधनों का इस्तेमाल भी गरीबों की मदद के लिया किया गया।
लॉकडाउन में जो पहली बार हुआ
सबसे बड़ा स्वास्थ्य सर्वे
करीब 15 लाख की आबादी का डाेर-टू-डोर स्वास्थ्य सर्वे कराया गया। कलेक्टर एस. विश्वनाथन ने राजस्थान के भीलवाड़ा से प्रेरणा लेते हुए यह कदम उठाया था। इसी वजह से संदिग्ध लोगों की पहचान हो पाई।
ऑनलाइन निकाह
इतिहास में पहली बार ऑनलाइन निकाह पढ़ाए गए। वह भी एक-दो नहीं बल्कि 12। क्योंकि ये शादियां टूटने की कगार पर थीं। शहर में सामूहिक विवाह रद्द होने से यह तरीका अपनाना पड़ा।
थूकने पर मुकदमा
सार्वजनिक जगह पर थूकने पर जुर्माना लगाने का काम पहली बार हुआ। अब तक स्टेशन, अदालत में यह कार्रवाई कभी कभार होती रही है। पर सड़कों पर थूकने वालों पर पहली बार जुर्माना लगाया गया।
इसलिए अच्छा रहा लॉकडाउन
पर्यावरण : जब से प्रदूषण की निगरानी शुरू हुई है तब से अब तक पहली बार एक माह तक हवा इतनी शुद्ध रही। 23 मार्च से 22 अप्रैल तक हवा में सबसे खतरनाक माने जाने वाले कण पीएम 2.5 की मात्रा औसतन 22 माइक्रो ग्राम प्रति मीटर(एमजीएम) रही। जबकि 23 फरवरी से 20 मार्च के बीच यह मात्रा औसतन 45 से 55 माइक्रो ग्राम प्रति मीटर थी। इसी तरह धूल के महीन कण लॉक डाउन के माह में 55-60 एमजीएम रहे। जबकि इससे पहले के महिने में यह औसतन 90 से 100 एमजीएम थे।
पेट्रोलियम की खपत : पेट्रोल की खपत में जबदस्त गिरावट आई जबकि डीजल के मामले में गिरावट का स्तर कम रहा। पुलिस पेट्रोल पंप से मिले आंकड़ों के मुताबिक 23 मार्च से 23 अप्रैल तक 87 हजार 262 लीटर पेट्रोल और 81 हजार 017 लीटर डीजल की खपत हुई। लॉकडाउन में पेट्रोल की खपत गिरकर 27 हजार 618 लीटर रह गई। दूसरी ओर डीजल की खपत 53 हजार 477 लीटर पहुंच गई। ट्रक, सरकारी वाहन, फायर ब्रिगेड, बसों की वजह से डीजल की खपत में गिरावट ज्यादा है।
लॉकडाउन की मार
1. लाखों मेहनतकश अब दूसरों की दया पर निर्भर : इस संकट ने लाखों मेहनतकश लोगों को दूसरी की दया पर निर्भर कर दिया है। रोज कमा-खाने वाले 5 लाख से ज्यादा लोग व उनके परिवार इस अभूतपूर्व संकट को झेल रहे है। अगले कई माह तक यह लोग इस संकट से उबर नहीं पाएंगे।
2. अर्थव्यवस्था के इंजन किसान : आंचलिक अर्थव्यवस्था का इंजन माने जाने वाले 2 लाख से ज्यादा किसानों पर भी इस संकट की मार पड़ी है। इस बार रिकॉर्ड पैदावार होने से जो उम्मीद बंधी थी वह अब टूट रही हैं। छोटे किसानों ने तो गेहूं बेचने की जगह उसे बचाकर रखने का फैसला किया है, क्योंकि आने वाले कम से कम डेढ़ साल तक अर्थव्यवस्था में पैसे का टोटा रहने वाला है। जो किसान गेहूं बेच रहे हैं उन्हें औसतन 1600 से 1700 का भाव मिल रहा है, जबकि समर्थन मूल्य 1925 रुपए तय किया गया है।
3. इस समय सबसे बड़ी आर्थिक गतिविधि : शादियां ही थीं। अप्रैल से जून तक 15 से 18 बड़े मुहूर्त थे। इस दौरान 100 करोड़ से ज्यादा कारोबार होना था। 10 हजार से ज्यादा परिवारों का इससे भरण पोषण होता। यह पूरा मार्केट या तो ठप हो गया है या सिर्फ औपचारिकता की जा रही है। लोग घरों में चार मेहमानों की मौजूदगी में शादी कर रहे हैं। सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो यह एक बहुत अच्छा चलन माना जाना चाहिए। पर अर्थव्यवस्था की के नजरिए से बहुत निराशाजनक तस्वीर है।

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