आज भी कुछ ऐसे इंसान हैं जो नाम की शोहरत नहीं काम की शोहरत पाकर अपनी पहचान छुपाए रखे है। बंशीधर नगर में ऐसे शख्स है जो 30 वर्षों तक कड़ी मेहनत की और पहाड़ को हरा भरा कर सबको नई राह दिखाई है। सुनेश्वर चौधरी ने तीन दशक से कड़ी मेहनत कर लगभग 10 एकड़ पहाड़ी क्षेत्र को हरा भरा कर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए सकारात्मक संदेश दिया है। सुनेश्वर बंशीधर नगर प्रखंड अंतर्गत चितविश्राम पंचायत के बंबा गांव के निवासी हैं। उन्होंने पहाड़ी पर यह हरियाली अपना अधिकार जताने के मकसद से नहीं बल्कि सभी के लिए किया है। सुनेश्वर चौधरी की दिनचर्या संत महात्मा जैसी है। पहाड़ी पर कुटिया में रहना, गोसेवा, पेड़ पौधों का संरक्षण और परमार्थ कार्य उनकी दिनचर्या में शामिल है। नित्य प्रातः उनके दिन की शुरुआत गोसेवा से होती है। दिन में वृक्षों की सेवा और शेष समय परमार्थ में बीतता है। लिहाजा उनके इस कार्य व्यवहार से इस क्षेत्र को लोगों ने इस स्थल को आश्रम का नाम दे दिया है। सुनेश्वर की कड़ी मेहनत से जहां आज हरियाली है, उस क्षेत्र के अगल बगल आज भी पुटुस (जंगली कांटेदार झाड़ी) के पेड़ है। लेकिन उसके बीच में कई दुर्लभ पेड़ पौधे आज लोगों को बरबस आकर्षित हैं। शायद वन विभाग को इतने क्षेत्रफल में हरियाली लाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ जाते। लेकिन सुनेश्वर ने केवल अपने मेहनत की बदौलत इस क्षेत्र को स्वर्ग बना दिया। यह स्थल श्री बंशीधर नगर के लोगों के लिए प्रमुख पिकनिक स्थल बन गया है। यहां के दुर्लभ पौधों एवं वनस्पतियों के बीच समय गुजार कर लोगों को सुखद अनुभूति होती है। सुनेश्वर चौधरी ने अकेले दम पर विभिन्न किस्म के फलदार, औषधीय, इमारती एवं दुर्लभ पौधों का रोपण और एवं संरक्षण किया है। सुनेश्वर को 1990 में घर से विरक्ति हो गई और वे भरा पूरा परिवार छोड़कर निमियादामर के जंगल में एक कुटिया बनाकर रहने लगे। घर से निकलने के बाद वे अपने साथ एक देशी गाय भी लेकर पहाड़ी पर आये थे। उसी गाय से उनके पास वर्तमान समय में 40 से ऊपर गाय बछड़े हैं। सुनेश्वर इन गाय का व्यवसायिक प्रयोग बिल्कुल भी नहीं करते है। गाय के गोबर का प्रयोग खाद के रूप में पेड़ पौधों में प्रयोग करते है और अपने आवश्यकतानुसार दूध निकालकर बाकी बछड़ों को पिला देते हैं। सुनेश्वर बताते है कि उन्होंने आज तक यहां के एक फल और दूध आदि को कभी नहीं बेचा। पेड़ पौधों से लगाव के विषय में कहते हैं कि 1990 से पूर्व ही पूरा जंगल उजाड़ हो चुका था सो उन्होंने संकल्पित तरीके से पेड़ लगाना एवं जो थोड़े बहुत पेड़ बच गये थे उसे संरक्षित करना शुरू कर दिया। राह इतनी आसान भी नही थी। पौधों की सिचाई के लिए पहाड़ी पर अकेले दो दो कुआं की खुदाई की और बाल्टी से नियमित रूप से पौधों को पानी देना प्रारंभ किया। लिहाजा मेहनत रंग लाया और देखते ही देखते पहाड़ी पर पुनः खोई हुई हरियाली लौट गई। उनके उपवन में किसी का एकाधिकार नहीं है। फल खाने एवं औषधि के लिए सबको छूट है लेकिन एक दातुन तक तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं है।

सुनेश्वर के आश्रम में उपलब्ध है कई दुर्लभ पौधे: सुनेश्वर के तैयार किये गये उपवन में कई दुर्लभ किस्म के पौधे विद्यमान है। उन्होंने पहाड़ी पर एक दर्जन पीपल, और आधा दर्जन बरगद के पौधे लगाए हैं। उनके उपवन में पियार, काजू, बादाम, चिरैता, साल, शंखपुष्पी, संतरा, काली हल्दी समेत कई दुर्लभ वनस्पतियां मौजूद है। इसके अलावा हर्रे, बहेरा, पाकड़, विभिन्न किस्म के आम, अमरूद, बेर, नीबू, शीशम, सागवान, करम, बरगद, पीपल, आँवला, गमहार और बांस इत्यादि के पौधे है। सभी पौधे काफी बड़े हो गये है। सभी पेड़ पौधे प्राकृतिक रूप से तैयार हो रहे है एक भी पेड़ की छंटनी नही की जाती है। सुनेश्वर समयानुसार विभिन्न सब्जियां भी उगाते है अपने उपयोग के बाद जो भी सब्जी बचती है उसे आम लोगों के बीच निःशुल्क रूप से वितरित कर देते हैं।

सुनेश्वर ने अपना पूरा जीवन प्रकृति को समर्पित कर दिया है। उनके दिनचर्या की शुरुआत गोसेवा से होती है। गोसेवा के बाद वे पूरा समय पेड़ पौधों को देते है। उनका आहार भी शुद्ध प्राकृतिक होता है।

सुनेश्वर चौधरी।
Bansidhar Nagar News - 30 years of hard work learning about environmental protection by making the desolate mountain green



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